अमृत वाणी - संत वाणी - 37

“संसार की चिंता छोड़ो और यह खोजो कि यह चिंता करने वाला ‘मैं’ कौन हूँ? जब तक अहंकार जीवित है, तब तक प्रश्न और समस्याएँ रहेंगी। अहंकार के विलीन होते ही केवल अनंत शांति शेष रह जाती है।”आधुनिक युग के महान संत महर्षि रमण का यह उपदेश सुनने में बहुत सरल लगता है, लेकिन इसे समझने में लोग अक्सर बड़ी भूल कर बैठते हैं। लोग सोचते हैं कि यदि मैं संसार की चिंता करना ही छोड़ दूँगा, तो मेरे बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की दवाई और घर के खर्चों का क्या होगा? क्या संत हमें पूरी तरह स्वार्थी और उदासीन