भारत के महाराष्ट्र के चौदहवीं शताब्दी के परम सिद्ध, विद्रोही और वारकरी संप्रदाय के महान संत चोखामेला जी की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रसिद्ध अमृत वाणी (अभंग) यहाँ दी गई है। यह वाणी समाज में किसी व्यक्ति की जाति, रंग या बाहरी रूप को न देखकर उसके भीतर छिपी आत्मा और प्रेम की शुद्धता को पहचानना सिखाती है।संत चोखामेला जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के सामाजिक ऊंच-नीच के पाखंड को तोड़कर भीतर के सच्चे भाव से जीवन जीने का मार्ग दिखाती है।“ऊस डोंगा परी रस नव्हे डोंगा।काय भुललासी वरलीया रंगा॥चोखा डोंगा परी भाव नव्हे डोंगा।”अभंग का हिंदी अर्थ