अमृत वाणी - संत वाणी - 27

“ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।अनेन वेद्यं सच्छास्त्रं, इति वेदान्त डिण्डिमः॥”“केवल ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत मिथ्या है। जीव भी ब्रह्म से भिन्न नहीं है, जीव ही ब्रह्म है। यही सच्चे शास्त्रों का सार है, यही वेदान्त की घोषणा है।”गहरे अर्थ की व्याख्यायह वेदान्त का महावाक्य है। इसे समझने में अक्सर भ्रम हो जाता है। ‘मिथ्या’ का अर्थ ‘झूठ’ नहीं है। ‘मिथ्या’ का अर्थ है — ‘जैसा दिखता है, वैसा न होना।’जैसे रस्सी को अंधेरे में देखकर सर्प समझ लिया जाए। सर्प वहां है नहीं, पर दिख रहा है। यह सर्प ‘मिथ्या’ है। प्रकाश आते ही सर्प गायब