अमृत वाणी - संत वाणी - 21

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हम अक्सर सोचते हैं कि बहुत बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान कर लेना, शरीर पर विशेष तरह के तिलक लगा लेना, या दिन-भर केवल मंदिर-मस्जिद के चक्कर काट लेना ही सबसे बड़ी भक्ति है। हम बाहर से तो बहुत बड़े भक्त दिखाई देते हैं, लेकिन हमारे भीतर दूसरों के लिए नफरत, ईर्ष्या, लालच और गुस्सा वैसा का वैसा ही बना रहता है। इस बाहरी दिखावे और असली आंतरिक भक्ति के अंतर को संत सिंगाजी ने अपनी मालवी/निमाड़ी मिश्रित भाषा में बहुत ही सीधे शब्दों में समझाया है:“मन कूं न रंगाया, रंगाया तुम चोला।कहैं सिंगाजी सुनो भाई साधो, तुम तो मुख से राम-राम