हॉस्पिटल से बाहर निकलते ही ऐसा लग रहा था जैसे अंकिता और उसकी माँ की दुनिया एक ही पल में उजड़ गई हो। दोनों की आँखें खुली थीं, लेकिन होश कहीं खो चुके थे। सड़क पर लोग आ-जा रहे थे, गाड़ियाँ दौड़ रही थीं, लेकिन उन्हें न किसी की आवाज़ सुनाई दे रही थी और न ही अपने आसपास की कोई चीज़ दिखाई दे रही थी। बस दोनों चुपचाप एक-दूसरे का सहारा लेकर चलते जा रही थीं।काफी देर तक यूँ ही भटकने के बाद किसी तरह वे अपने घर पहुँचीं। घर का दरवाज़ा बंद होते ही अंकिता फूट-फूटकर रो पड़ी।