इधर अक्षिता वेदांश के वहां से जाते ही सीधा श्री के पास आती है.. श्री जिसका ध्यान अभी भी सीढ़ियों की तरफ ही था... भले ही वेदांश जा चुका था...,मगर उसने अपनी नजर नहीं बचाई थी... और श्री का ये एक नजर उस तरफ देखना भी अक्षिता के कलेजे में आग जलाने का काम कर रहा था।वह श्री की बाजू पकड़ कर अपनी तरफ घूमती है। श्री जिसका ध्यान ही नहीं था। वह चौंक कर अक्षिता को देखती है।अक्षिता उसे देखकर गुस्से से बोली ... "क्या देख रही थी तुम उस तरफ हम्ममम..? बोलो .. क्या देख रही थी तुम."श्री