नवीन भवति

ऋगुवेद सूक्ति--(51)की व्याख्या “नव्यो नव्यो भवति” (ऋग्वेद-- 1/31/8)का भाव बहुत प्रेरणादायक और गहन है। शब्दार्थ:--नव्यो नव्यः = बार-बार नया, सदैव नवीनभवति = होता है / बनता है भावार्थ:मनुष्य को हमेशा अपने विचारों, कर्मों और जीवन-दृष्टि में नवीनता बनाए रखनी चाहिए।अर्थात—जड़ता, आलस्य और पुराने, अप्रासाँगिक विचारों में अटके न रहकर निरंतर विकास, परिवर्तन और नव-सृजन की ओर बढ़ते रहना ही जीवन की सार्थकता है। गहन व्याख्या:ऋग्वेद यहाँ यह संकेत देता है किप्रकृति स्वयं हर क्षण नई होती रहती है (सूर्योदय, ऋतुओं का परिवर्तन)।जो व्यक्ति भी नवीनता (innovation) को अपनाता है, वही जीवंत और प्रगतिशील रहता है।मानसिक, आध्यात्मिक और व्यवहारिक स्तर पर “नया बने रहना” ही