सुबह लगभग छह बजे अलार्म बजा तो अवंतिका ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी। आँख बंद करते ही वही सफ़ेद कपड़ों वाली औरत सामने आ जाती। कभी सड़क की लाइट के नीचे खड़ी दिखाई देती, तो कभी काली कोठी की खिड़की में।कुछ पल तक वह चुपचाप छत को देखती रही। फिर तकिए के पास रखा मोबाइल उठाया और सबसे पहले वही तस्वीर खोली।काली कोठी...उसने तस्वीर को ज़ूम करके खिड़की वाला हिस्सा देखा।इस बार वहाँ कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। बस धुंधली-सी दीवार और पुरानी तस्वीर का धुंधलापन।अवंतिका हल्का-सा मुस्कुराई।"लगता है सच