टूटता हुआ मन - भाग 3

उस दिन विद्यालय का सभागार खचाखच भरा था। शांतनु मंच पर खड़ा था। उसकी आवाज़ में न कृत्रिमता थी, न प्रदर्शन—केवल अपने परिवार के प्रति सहज श्रद्धा थी।"मैंने अपने दादू को कभी देखा नहीं। वे एक साधारण शिक्षक थे, पर उनके विचार असाधारण थे। पूरे बांकुड़ा जिले में उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जो अलख जगाई, उसने हजारों बेटियों को नया जीवन दिया। लोग उनका नाम सम्मान से लेते हैं। उन्हें अनेक पुरस्कार मिले, पर मेरी माँ कहती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार लोगों का विश्वास था।माँ मुझे बचपन से एक ही बात कहती थीं—'बेटा, अपने मम्मी-पापा