मैं उस दिन रात भर ठाकुर साहब के बंगले पर ही था। ठाकुर साहब बिल्कुल अकेले थे, बस एक गार्ड उनके साथ मौजूद था। डॉक्टर ने चिंता जताई थी कि रात में उनके पास किसी का होना ज़रूरी है, इसलिए मुझे वहीं रुकना पड़ा। सुबह जैसे ही ठाकुर साहब को होश आया, तब औपचारिक रूप से मेरा उनसे परिचय हुआ। अब तक हम दोनों ही एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थे। मुझसे मिलकर वे कुछ संतुष्ट और निश्चिंत नज़र आ रहे थे। शायद इसलिए कि अचानक ज़रूरत पड़ने पर मैंने उनकी मदद की थी, और वे इस बात से खुश