सारे दृश्य महक के ज़ेहन में तैरने लगे —गौरव का चुप-चाप खिंचा-खिंचा रहना, हर बार पैसों की बात से किनारा करना, बच्चों की मासूमियत को नज़रअंदाज़ करना,और फिर एक दिन...बस यूँ ही...बिना कुछ कहे...चला जाना।महक की आँखों में सन्नाटा था, और दिल में अधूरा सवाल।तभी ताया जी की भारी आवाज़ गूंज उठी —"बेटा... हमारी तो कोई औलाद नहीं थी...तुम दोनों ही तो थे, हमारी पूरी दुनिया।तुम्हें क्या लगा... हम नहीं टूटे उस दिन?जब गौरव गया... जब सब छिन गया..."उनकी आँखें भर आईं।"हमने खुद को समेटा, सिर्फ तुम्हारे लिए... और दोनो बच्चों के लिए।ना पैसा रहा, ना साथ... और रिश्तेदार?वो तो