3.1 रास्ते की घबराहट और शीशे के सामने की बेचैनीअजय की बाइक धूल भरी सड़क पर दौड़ रही थी। हवा के झोंके चेहरे से टकराते, मगर उसका मन कहीं और भाग रहा था — धड़कनें इतनी तेज़ थीं जैसे इंजन की आवाज़ भी कम पड़ गई हो। “क्या होगा अगर सामने पसंद न आए… या उसने मुझे ही पसंद न किया तो?”उधर, गाँव के उस पुराने मकान के भीतर… लड़की शीशे के सामने खड़ी थी। कभी बालों की लट ठीक करती, तो कभी अपने कान की बाली सीधी करती। चेहरे पर हल्की-सी बेचैनी थी — “क्या होगा सब ठीक-ठाक? क्या