MTNL की घंटी - 23

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रात का समय था। हवाओं में हल्की ठंडक घुली थी और डाइनिंग हॉल में गर्माहट थी — प्यार, रिश्तों और स्वाद से भरी।टेबल पर तरह-तरह के व्यंजन सजे थे — शाही पनीर, तंदूरी रोटी, पुलाव, गुलाब जामुन…  चाऊमीन, पिज़्ज़ा   और भी न जाने क्या-क्या।परी और माधव फूले नहीं समा रहे थे।"मम्मी! आज तो होटल वाला  खाना  है!" परी चहक कर बोली।"मैं तो सबकुछ खाऊँगा!" माधव ने प्लेट उठा ली और सबको हँसा दिया।सिर्फ एक चेहरा था जो अब तक नहीं दिखा — देव।"अभी तक नहीं आया?" आलोक ने घड़ी की ओर देखा।"आ जाएंगे, शायद किसी लेखक को छोड़ने गए हों,"