मन की आजादी

  • 75

सारा की इस मर्मस्पर्शी यात्रा और मन की खोज को समेटती हुई एक कहानी:​ पिंजरे से झील तक: सारा की मुक्ति​ को बरसों बीत गए थे, लेकिन सारा को याद नहीं आता कि आख़िरी बार उसने खुलकर सांस कब ली थी। उसकी पूरी ज़िंदगी जैसे एक भारी दबाव के साए में गुज़र गई। कभी कोई समस्या, तो कभी कोई उलझन। अजीब बात यह थी कि ये सारी मुसीबतें बाहर से आती थीं—कभी अपनों की कड़वी बातें, कभी किसी बाहरी इंसान का बर्ताव, तो कभी आसपास का दमघोंटू वातावरण।​बाहर से आने वाले ये सारे तीर सारा के भीतर जाकर कहीं गहराई में दफ़्न हो