ऋग्वेद सूक्ति (72) की व्याख्यामा हृणीथा:ऋग्वेद---8/2/19से ईश्वर ! हमसै रुष्ट मत हों। पूरा श्लोकहाँ, ऋग्वेद 8.2.19 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—ओ षु प्र याहि वाजेभिर्मा हृणीथा अभ्यस्मान् ।महाँ इव युवजानिः ॥(ऋग्वेद 8.2.19)पदच्छेदओ । सु । प्र । याहि । वाजेभिः । मा । हृणीथाः । अभि । अस्मान् । महान् इव । युवजानिः ॥शब्दार्थयाहि = आओ, पधारोवाजेभिः = ऐश्वर्य, बल, धन या अनुग्रहों के साथमा हृणीथाः = हमसे रुष्ट मत होओ, अप्रसन्न मत होओअभ्यस्मान् = हमारी ओर, हमारे प्रतिमहान् इव युवजानिः = जैसे कोई महान पुरुष अपनी नवयुवती पत्नी के प्रति स्नेहपूर्वक होता है भावार्थ"हे इन्द्र! ऐश्वर्य और कल्याणकारी शक्तियों