समस्या नहीं, समाधान की चर्चाजड़ों को सींचने की आवश्यकतासमाज की अनेक समस्याओं पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है—नारी सम्मान पर, कन्या सुरक्षा पर, बुजुर्गों की सेवा पर, परिवारों के विघटन पर और नैतिक पतन पर भी। निस्संदेह इन प्रयासों का प्रभाव पड़ा है। सद्विचार कभी निष्फल नहीं होते। वे किसी न किसी हृदय में अंकुरित होकर परिवर्तन का कारण बनते हैं।किन्तु आज मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि केवल समस्याओं की चर्चा पर्याप्त नहीं है। अब समय उन जड़ों की ओर देखने का है जहाँ से ये समस्याएँ जन्म लेती हैं।वास्तव में समस्या कहाँ उत्पन्न होती है?मेरे विचार से