श्री और हरि की नोक झोक तो हमेशा की तरह चल रहीं थी श्री बार बार देखिए हरि जी हमे प्रिय प्रियतमा मत बोलिए समझे आप और हरि बार बार ठीक है प्रियतमाश्री— ऑफ हो आप कितने जिद्दी है समझ नहीं आता आपको मत बोलिए न ( बाहर से शख्त लेकिन भीतर ही भीतर श्री को अच्छा लग रहा था यू हरि का उसे परेशान करना )हरि— अब आप हमारी प्रियतमा है प्रियतमा न बोले तो क्या बोले जिसे प्यार करते है उसे यही कहते है श्री— झूठा गुस्सा दिखाते हुए –हरि जी हमने अभी तक आपके प्यार को