वही गुरुदेव ने सार्थक को भी बात करने को बुलाया था जैसे ही सार्थक गुरुदेव के कक्ष के पास आया उसने श्री और गुरुदेव की बात सुन ली....अब बिचारे सार्थक का तो दिल ही टूट गया था क्यूंकि उसने सुना कि श्री अपनी आत्मग्लानि के कारण हरि को स्वीकार नहीं कर पा रही लेकिन उसके मन में हरि के लिए भावनाएं है . और अब वो भक्ति में भी इतनी प्रवीण हो चुकी है कि भक्ति मार्ग का त्याग कभी नहीं करेगी श्री अपने भगवान नारायण के प्रति भी पूर्ण समर्पित है और गुरुदेव के हाथ में पूरा निर्णय है