मैं एक बार फिर से उसी सिचुएशन में खड़ा था, जहाँ 8 साल पहले था। तब मैंने अपना घर छोड़ा था, और आज फिर से वही सब रिपीट हुआ। एक बार फिर सब कुछ पीछे छोड़कर मैं दूसरे अनजान शहर आ गया। मुझे नहीं पता था कि इस बार क्या होने वाला है, किस्मत मुझे कहाँ तक आज़माने वाली है। लेकिन फिलहाल मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल फिर से वही था—रहने के लिए घर और खाने के लिए दो वक्त की रोटी का। 3-4 दिन फिर से परेशान रहने के बाद मुझे आखिर रहने और खाने का बंदोबस्त हो ही