ऋग्वेद सूक्ति(69) की व्याख्या "यद्भद्रं तन्न आसुव"ऋगुवेद--5/82/5भावार्थ --हे ईश्वर ! जो हमारे लिए शुभ है, वह हमें प्रदान करें।पूरा मंत्र अर्थ सहित --उद्धृत पंक्ति "यद्भद्रं तन्न आ सुव" ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र का उत्तरार्ध है।मन्त्रविश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥— ऋग्वेदशब्दार्थविश्वानि = समस्त, सभीदेव = हे दिव्य प्रकाशमान देव!सवितः = हे सविता (सृष्टि को प्रेरणा देने वाले परमेश्वर)!दुरितानि = दुःख, पाप, कष्ट, बाधाएँ, बुराइयाँपरा सुव = दूर कर दीजिएयत् भद्रम् = जो कल्याणकारी, शुभ और हितकारी होतत् = वहनः = हमेंआ सुव = प्रदान कीजिए, हमारे पास लाइएभावार्थहे ईश्वर! हमारे सभी दुःखों, कष्टों, पापों और अनिष्टकारक प्रवृत्तियों