गीता आज के इंसान के लिए – (अध्याय -4)

  • 345
  • 1
  • 123

------------------------------ अध्याय 4: रिश्ते और अपेक्षाएँ  (संबंधों का भ्रम: प्रेम की शुचिता या व्यापार का खेल?)------------------------------  भाग 1: जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह केवल एक मानसिक व्यापार हैआइए आज तुम्हारे जीवन के उस सबसे संवेदनशील और पाखंड से भरे हिस्से की परतें खोलते हैं जिसे तुम 'रिश्ते' (Relationships) कहते हो।जब तुम्हारा कोई दोस्त, तुम्हारा पार्टनर, या तुम्हारा कोई पारिवारिक सदस्य तुम्हारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो तुम टूट जाते हो। तुम कहते हो, "मेरा दिल टूट गया, मेरे साथ धोखा हुआ है। मैंने उस व्यक्ति के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, लेकिन उसने बदले में मुझे सिर्फ आंसू