प्यार की परीभाषा - 11

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मंदिर से लौटते वक्त गाड़ी में अजीब सी खामोशी थी न कोई हंसी न कोई हल्की-फुल्की बात रवीना खिड़की के पास बैठी थी। उसके हाथ उसकी गोद में टिके हुए थे, उंगलियाँ एक-दूसरे में उलझी हुईतुषार उसके बगल में बैठा था लेकिन दोनों के बीच जैसे एक अदृश्य दूरी थी आगे महेश गाड़ी चला रहे थे सुषेला उनके बगल में बैठी थी, चुप लेकिन उसका चेहरा सख्त थाघर पहुँचे,दरवाज़ा खुला रवीना ने एक पल के लिए अंदर कदम रखने से पहले ठहरकर घर को देखा यही अब उसका घर था लेकिन अंदर कोई इंतज़ार नहीं कर रहा था।सुषेला सीधे अंदर