घर आकर मैं कुछ देर कुलदीप सेठ के साथ बैठा रहा। उनके होंठों पर जैसे एक ही बात अटक गई थी—“मीरा बहुत अच्छी लड़की है... सगाई की तारीख कब की रखनी है?” वो लगातार मुझसे बातें किए जा रहे थे और मैं बस खामोश बैठा सुनता रहा। बड़ी मुश्किल से मेरे होंठ हिले और मैं इतना ही कह पाया, “सोचकर बताता हूँ...” यह कहकर मैं लगभग भागता हुआ अपने कमरे में आ गया। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा अपना दिमाग मुझ पर ठहाके लगा रहा हो। मैं इतना बड़ा बेवकूफ कैसे हो सकता था? बिना मीरा के बारे में