त्याग नहीं, देखना — द्वैत के पार — 𝓐𝓰𝔂𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲धर्म की पुरानी भाषा प्रायः कहती रही है —"छोड़ो।"वासना छोड़ो।लोभ छोड़ो।अहंकार छोड़ो।संसार छोड़ो।मानो सत्य किसी त्याग के बाद मिलने वाली वस्तु हो।परंतु एक सूक्ष्म प्रश्न है —क्या मन वास्तव में छोड़ सकता है?अनुभव कहता है — नहीं।मन जब एक चीज़ छोड़ता है,उसी क्षण दूसरी पकड़ लेता है।धन छोड़ा,तो त्याग का गर्व पकड़ लिया।संसार छोड़ा,तो संन्यासी होने की पहचान पकड़ ली।इच्छा छोड़ी,तो निष्काम होने का अहंकार पकड़ लिया।त्याग का उत्सव मनाने वाला मन,वास्तव में त्याग नहीं रहा होता,वह केवल पकड़ का विषय बदल रहा होता है।यही कारण है कि त्याग