कमरे में एसी चल रहा था, फिर भी संजना की हथेलियां पसीने से तर थीं। फोन को इतनी जोर से पकड़ा हुआ था कि उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे — जैसे अगर उसने ज़रा भी ढील दी, तो कुछ छूट जाएगा जो वापस नहीं आएगा। यार संजना, रिलैक्स कर! दूसरी तरफ से रिया की आवाज़ आई — बेफिक्र, हल्की, उस किस्म की जो सिर्फ उन्हीं लोगों की होती है जिनके लिए दरवाज़े हमेशा खुले रहे हों। तूने जी-तोड़ पढ़ाई की है। पिछले साल भी तूने टॉप किया था। पता नहीं रिया... अजीब सी बेचैनी है। किस बात की? रिया हंसी। तेरे