रविवार की सुबह थी। कई दिनों बाद घर में थोड़ा सुकून था। राधा ने सबके लिए नाश्ता बनाया था।हॉल में— राधा रितांश रितांशी और सिद्धिदात्रीसाथ बैठे थे।राधा ने प्यार से पूछा—बेटा, तुम्हारा घर कहाँ है?सिद्धिदात्री कुछ पल चुप रही। उसकी मुस्कान हल्की पड़ गई।फिर उसने धीरे से कहा—आंटी... मुझे नहीं पता।सब उसे देखने लगे।रितांशी ने पूछा -मतलब?सिद्धिदात्री ने सिर झुका लिया।वो बोली - कल सुबह जब मेरी आँख खुली...तो मैं एक पार्क की बेंच पर बैठी थी। मुझे अपना नाम याद है...लेकिन उसके अलावा कुछ नहीं।पूरा हॉल कुछ सेकंड के लिए शांत हो गया। राधा के चेहरे पर चिंता आ गई।वो