अध्याय 1"जब तक मैं 'अंशिका' तन्हा थी, तब तक यह जिंदगी सिर्फ एक गुजारा थी; मैं जी नहीं रही थी, बस सांसें काट रही थी। पर जिस दिन 'मृत्युंजय' मेरी तकदीर से मिला, मुझे एहसास हुआ कि असल में जिंदगी किसे कहते हैं। वह मेरे रूह का सुकून बन गया और मेरे चेहरे पर ऐसी मुस्कुराहट सजा दी, जो अब वक्त की मोहताज नहीं है। कल तक जो सिर्फ एक सफर था, आज 'मृत्युंजय' के आने से वही मेरी मंजिल बन गई है।"अध्याय 2: मुकम्मल एहसास"जब 'अंशिका' और 'मृत्युंजय' की राहें एक हुईं, तो लगा जैसे पूरी कायनात ने मेरी