उन होठों पर खेलती उस मुस्कुराहट को देख अनायास ही वेदांश को अपना गला सूखता हुआ महसूस हुआ मगर उसके चेहरे का रंग तो तब उड़ा जब कुछ जुल्फे उन होठों को छूती है... न... जाने.... कैसी आग लगाई थी उन जुल्फों ने वेदांश के अंदर... कि उसके हाथों की मुट्ठी कुछ इस कदर भींची जैसे आज उन जुल्फों का आज नामोनिशान ही मिटाकर मानेगा...।अब आगे .... वेदांश के हाथों की मुट्ठी बुरी तरह भींची हुई थी। उसके जबड़े आपस में कसे हुए थे। लेकिन क्यों?... शायद इसका जवाब तो उसके पास भी नहीं था...धीरे–धीरे कर श्री अपनी आंखे खोलती है...