बर्दाश्त की हद

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 बर्दाश्त की हद कमल चोपड़ा​वह अक्सर चोटें खाकर डॉ. मदान के क्लीनिक पर आती। चोटें लगने का कारण भी हर बार एक ही होता। फिर भी पूछने पर रोते-सिसकते हुए यह बताती कि उसके तो भाग ही फूटे हुए हैं। उसका पति शराबी और जुआरी है। कैसे-कैसे मेहनत कर-करके वह पाई-पाई जोड़ती है और वह छीन ले जाता है। जुए में हार जाता है और सारी खीझ उस पर निकाल देता है। जिंदगी नरक बना रखी है। कभी-कभी किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो गया तो वो उसका पति है इसलिए बर्दाश्त करने के सिवाय वह कर क्या सकती है?​पांच-दस दिन