स्त्रीतत्त्व: मूल स्वरूप और मौलिक संवेदना

 भूमिकापहला शब्द आने से पहलेयह पुस्तक पहले से योजनाबद्ध नहीं थी। न यह किसी पुस्तकालय में जन्मी, न किसी शोध-प्रबंध की मेज़ पर, न किसी पाठ्यक्रम के ढाँचे में। यह वैसे आई जैसे सच्ची बातें आती हैं — मौन में।एक शाम वर्षा को देखते हुए मेरे मन में एक ऐसी बात उठी, जो पहले भी थी, पर देखी नहीं गई थी। वर्षा पृथ्वी से बहस नहीं करती। वह बस बरसती है। पृथ्वी वर्षा का प्रतिरोध नहीं करती। वह उसे स्वीकार कर लेती है। और इसी मिलन से — इस प्राचीन, शब्दहीन मिलन से — जीवन जन्म लेता है।मैंने स्त्री के