जिस जीवन में तुम थे - 3

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अप्रैल की शुरुआत में शहर पर एक अजीब-सी धूप उतरती है।न वह सर्दियों की कोमल धूप होती है, न गर्मियों की कठोर।बस एक ऐसी धूप, जो पुरानी यादों की तरह कंधों पर आकर बैठ जाती है।समर ने उस दिन तीसरा पत्र लिखा।लेकिन उससे पहले उसने कई दिनों तक कुछ नहीं लिखा था।उसे डर लगने लगा था।डर इस बात का नहीं कि वह अजनबी स्त्री उत्तर देना बंद कर देगी।डर इस बात का था कि वह उत्तर देती रहेगी।मनुष्य जिन चीज़ों का अभ्यस्त हो जाता है, उनके खोने का भय भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है।और समर को प्रतीक्षा की