वर्तमान नकलूसी गुरु और प्राचीन बोध

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बोध पहले अनुभव है, बाद में शास्त्र। पहले भीतर एक घटनाक्रम घटता है — आनंद, मौन, संतोष, प्रस्फुटन, सहजता। बाद में बुद्धि उसे भाषा देती है, और वही भाषा शास्त्र, पद, दोहा, भजन, सूत्र, या दर्शन बनती है।इसलिए प्राचीन युग में जो “दिव्य मिलन” या “राम-कृष्ण-शिव-विष्णु-देवी” जैसा अनुभव कहा गया, वह vedant  दृष्टि में किसी बाहरी व्यक्ति से मुलाकात नहीं, बल्कि भीतर के बोध की भाषा थी। अर्थात् मनुष्य ने उस समय अपने भीतर उठी ऊर्जा को प्रतीक दिया। आज की समस्या यह है कि लोग प्रतीक को पकड़ लेते हैं, अनुभव को नहीं। वे मुखौटा ले लेते हैं, बोध