तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई और हमारी नज़र उधर उठ गई। एक नौकर हाथों में चाँदी जैसी चमकती ट्रे लिए खड़ा था। ट्रे में बर्फ से ठंडे शरबत के गिलास सजे हुए थे। वह बड़े सलीके से हमारे पास आया और एक-एक गिलास हमारे सामने रख दिया। मैंने और कुलदीप सेठ ने अपने-अपने गिलास उठा लिए। "लीजिए सर।" इतना कहकर नौकर वापस चला गया। कमरे में फिर से खामोशी छा गई। कुलदीप सेठ धीरे-धीरे शरबत की चुस्कियाँ लेते हुए पूरे कमरे का जायज़ा ले रहे थे। उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रहा था कि वे अंदर ही अंदर