गहरा समंदर

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---*कहानी: माफ़ करने के लिए नहीं रुके*  *लेखिका: डॉ वंदना शर्मा*दिन ढलने ही वाला था, आसमान में बादल छाए हुए थे। सागर समुद्री तट पर बैठा हुआ, समुद्री लहरों को उछलते हुए देख रहा था। वह अपनी अतीत की यादों में खोया हुआ था।सागर एक 45 वर्षीय युवा था। परिवार की जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं ने उसे एक गहरा समन्दर ही तो बना दिया था। वह अपना दुःख किसी से ना कहता। हर ग़म को हँसी में टाल देता। कोई पूछता उससे "कैसे हो?", प्रति उत्तर में हँसकर खुद एक सवाल उछालता, "कैसा लग रहा हूँ मैं? एकदम झकास ना"।होते हैं कुछ