श्रापित एक प्रेम कहानी - 85

चतुर आलोक से कहता है:" ये क्या यार यहां पर ताला लगा है। लगता है सभी बाहर हुए है। अब क्या करें यार ?" आलोक बिना कुछ जवाब दिये हवेली के गेट के पास जाता है। जहां पर दिवार मे एक छोटी सी खिड़की जैसी थी जिसमे एक छौटा सा दरवाजा लगा था । जिसे बहोत गौर से दैखने पर ही पता चलता था। आलोक उस दरवाजा को खोलता है और उसमे से चाबियां निकालकर मेन गेट को खोल देता है। चतुर ये सब दैखकर हैरान था । चतुर हैरानी से आलोक से कहता है:" ये क्या था यार मैं कितनी बार