MTNL की घंटी - 17

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महक हाल से बाहर आ गई थी। भीतर की भीड़, शोर और हवा में फैली हुई परफ्यूम की मिली-जुली महक उसे घुटन जैसी लग रही थी। बाहर निकलते ही हल्की-हल्की बूंदें उसके चेहरे को छू गईं। हवा में ठंडक थी, और उसके शरीर में एक हल्का सा बुखार पहले से ही दस्तक दे चुका था, पर बारिश में भीगने का आकर्षण उसे अंदर खींच रहा था।वह यूँ ही खड़ी थी, जैसे किसी अनजानी सोच में डूबी हो, तभी एक गंभीर और नरम आवाज़ पास से आई—"महक जी?"वो चौंकी, मुड़ कर देखा — एक सौम्य, सधे हुए चेहरे वाले व्यक्ति उसके