ऋगुवेद सूक्ति-- (7) की व्याख्या "न यस्य हन्यते सखा न जीयते ऋगुवेद- --10/152/1भावार्थ --हे प्रभु! आपके भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है और न जीत सकता है। इस मंत्र का पूरा श्ल़ोक अर्थ सहितऋग्वेद 10.152.1 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—शा॒स इ॒त्था म॒हाँ अ॑स्य मित्रखा॒दो अद्भु॑तः ।न यस्य॑ ह॒न्यते॒ सखा॒ न जीय॑ते॒ कदा॑ च॒न ॥ �शब्दार्थमहान् असि — आप महान हैं।अमित्रखादः — शत्रुओं का नाश करने वाले।अद्भुतः — आश्चर्यजनक, विलक्षण।यस्य सखा — जिसका आप मित्र हैं।न हन्यते — वह नष्ट नहीं होता।न जीयते — वह पराजित नहीं होता।कदा चन — कभी भी नहीं। भावार्थहे परमेश्वर (या इन्द्र देव)! आप महान, अद्भुत