बदन पर किसी ठंडी चीज का एहसास पाकर मेरी तंद्रा टूटी। विचारों के भंवर से बाहर निकल कर देखा तो सामने निधि बैठी हुई थी, उसके हाथ में बाम की एक डिब्बी थी जिससे वह बाम मेरे गले पर लगा रही थी। “तुम कब आई” - मैंने पूछा। “बीवीजी तो पिछले 2 दिन से यहीं पर है बाबूजी”। हाथ में चाय के प्याले लेकर सामने से आते हुए बनवारी ने मुझसे कहा। “पिछले 2 दिन से” - मैंने सकुचाते यह कहा “मेरी बात नहीं मानोगे तो ऐसा ही होगा” - थोड़ा गुस्से से निधि बोली। “मैंने तुम्हारी कौन सी बात