ईश्वर की महिमा अनन्त

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ऋगुवेद सूक्ति-- (8) की व्याख्या "न विन्धेश्य सुष्टतिम"ऋगुवेद --1/1/7भावार्थ --मै स्तुति से पार नहीं पा सकता। उद्धृत मन्त्र ऋग्वेद 1.7.7 का है। सही पाठ इस प्रकार है—तुञ्जे-तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः ।न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥— ऋग्वेदशब्दार्थतुञ्जे-तुञ्जे — प्रत्येक संघर्ष या यज्ञ मेंयः उत्तरे स्तोमाः — जो उत्तम स्तुतियाँ हैंइन्द्रस्य वज्रिणः — वज्रधारी इन्द्र कीन विन्धे — नहीं पा सकता / पूरी तरह ग्रहण नहीं कर सकताअस्य सुष्टुतिम् — उसकी उत्तम स्तुति का पारभावार्थ“वज्रधारी इन्द्र की जो महान और उत्तम स्तुतियाँ हैं, उन्हें मैं पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर सकता; उनकी महिमा का पार पाना कठिन है।”अर्थात् ऋषि कहते हैं