वक़्त कभी किसी का नहीं... मत सोचो, इस मीठी बातो से इसे भरमा लोगे... नहीं कड़वा बोल कर देख लो... थोड़ा सा, हक़ीक़त यूँ बाहर आ जाये गी। ये नाटक रुपात्रिक" समय "के मुताबिक जो ढल गया, बन गया... कुछ न कुछ जो समय को नहीं समझा... वो तो बारूद की तरा फट जायेगा। चलना सिखो.... बैठे गे फिर कभी। ये नाटक समय के आधरत है। किर्पा ये किसी के लिए चीटिंग के लिए नहीं है, हकीकत है ये नाटक की कहानी। ------- (समय )-------- कलाकार :- जिसमे जाने