थोड़ी देर की खामोशी के बाद ताया जी बोले, “कल रविवार है…मैं टिकट बुक करवा देता हूँ---देहरादून की"महक ने एक गहरी साँस ली…शायद पहली बार वर्षों बाद उसने अपने दिल की दीवार को थोड़ा ढीला पड़ते महसूस किया।“अगर मैं चली गई… और यादें भी साथ आ गईं तो?” महक ने बहुत धीमे से कहा।“तो उन्हें भी हवा, बादल, पहाड़ दिखाओ…शायद वो भी हल्की हो जाएँ,” ताया जी मुस्कुराए।बेंच पर बैठी महक ने पहली बार आसमान की ओर देखा और उसे वो चमकती हुई सी लाइन नहीं, मुस्कुराता हुआ आसमान नजर आया ।