नंदनगढ का सूरज हमेशा की तरह ढल रहा था, लेकिन आज की शाम कुछ अलग थी. सूरज की किरणें जैसे हवेली की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं, मानो वे भी अंदर जाने से डरती हों.आर्यन ने अपनी पुरानी जीप को हवेली के मुख्य द्वार से कुछ दूर रोका. उसके सामने' राय निवास' खडा था. यह हवेली नहीं, बल्कि एक विशाल पत्थर का ताबूत लग रही थी. चारों तरफ फैली घनी झाडियाँ और बेलें ऐसे लिपट रही थीं जैसे वे इस इमारत को दुनिया की नजरों से छिपाकर रखना चाहती हों.आर्यन ने अपनी जैकेट का कॉलर ऊपर किया और