कालू की पहाड़ी - 2

(77)
  • 1.5k
  • 591

साहब, ये अंधविश्वास नहीं, उन मांओं का दर्द है जिनकी कोख सूनी हो गई और उन पिताओं की बेबसी है जिन्हें अपने बच्चों की अस्थियां तक नसीब नहीं हुईं।"शाम होते ही पहाड़ी के चारों ओर एक अजीब सी धुंध छा जाती है। लोग अपने घरों के दीये जलाते हैं और भगवान से बस एक ही दुआ मांगते हैं।कि आज की रात कालू शांत रहे। पर उन शांत रातों में भी, जब हवा तेज़ चलती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई 20 किलोमीटर दूर से ही फुसफुसा रहा हो... "मीना... तुम लौट आई?"अध्याय 2: नियति का खेल और बेंगलुरु के