ज्वेलरी शॉप से बाहर निकलते-निकलते शाम ढलने लगी थी। दिन भर की भागदौड़ के बाद दोनों परिवारों के चेहरों पर थकान साफ़ दिख रही थी, लेकिन साथ ही एक अजीब-सी औपचारिक संतुष्टि भी थी—जैसे एक और ज़रूरी काम निपट गया हो। महेश ने बाहर खड़े होकर सबको देखा, “चलो, सामने होटल में बैठकर कुछ खा लेते हैं, फिर निकलेंगे” किसी ने मना नहीं किया रेस्टोरेंट ज़्यादा बड़ा नहीं था, लेकिन साफ-सुथरा था सब लोग एक लंबी टेबल पर बैठ गए। बैठने की व्यवस्था अपने-आप बन गई—बड़े लोग एक तरफ, और बीच में तुषार और रवीना कुछ मिनट तक