दोपहर की रोशनी धीरे-धीरे ढल रही थी, लेकिन पेड़ के आसपास समय जैसे ठहर गया था मंडल पूरा हो चुका था। चारों दिशाओं में रखे दीपक बिना हवा के भी स्थिर जल रहे थे और उनके बीच खड़े लोग अब समझ चुके थे कि आगे जो होगा, वो साधारण नहीं होगा।तांत्रिक ने अपने थैले से काले कपड़े में लिपटा एक छोटा यंत्र निकाला उसने उसे सावधानी से मंडल के केंद्र में रखा ठीक उस जगह जहाँ डिब्बा रखा था आरव ध्यान से देख रहा थाआरव- ये क्या है?तांत्रिक- ये स्थिर करेगा जो बाहर आना चाहता हैकबीर ने धीमे स्वर में