MTNL की घंटी - 15

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आज दीवाली की रात थी…ना तो रंग-बिरंगी चूड़ियाँ थीं,ना साज-श्रृंगार, ना बिंदी, ना सिन्दूर…ना मांग में चमकता मंगलसूत्र।बस एक पीले रंग की सादी सी साड़ी…और उस पर एक सफेद पड़ा चेहरा,जैसे सालों से धूप देखी ही न हो।महक ने गौरव की तस्वीर के सामने दीपक रखा और बुदबुदाई —"क्यों छोड़कर चले गए…?आज तो दीवाली है, कैसे रहूँगी आपके बिना?""7 साल हो गए…""आपने एक बार भी नहीं सोचा हमारे बारे में…बच्चों के बारे में…हमें तो जैसे बीच भँवर में छोड़ दिया आपने।"गौरव की तस्वीर पर सिर रखकर वो जोर-जोर से रोने लगी।उसकी चीखती सिसकियाँ सुनकर परी और माधव भागते हुए आए