उस दिन के बाद मैं मीरा से अक्सर मिलने लगा। और हर मुलाकात के साथ एक अजीब सा खिंचाव और भी गहरा होता जा रहा था। मीरा के शौक इतने महंगे थे कि उसके लिए गिफ्ट लेते-लेते मेरी पूरी सैलरी जैसे हवा में उड़ जाती थी। महीने के बाकी दिन कैसे कटते थे, यह सिर्फ मैं जानता था—और शायद मेरी खामोशी भी। लेकिन मैं खुद को समझा लेता था कि बस थोड़ा सा वक्त और… फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। शायद किस्मत भी, और हालात भी, अपने हिसाब से लौट आएँगे। इसी उम्मीद के सहारे मैं जिंदा सा चल