आत्मबोध

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ऋगुवेद सूक्ति-- (१४) की व्याख्या ऋग्वेद के मंत्र “यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति""… (१.१६४.३९)  भावार्थ --ब्रह्म-तत्त्व को जाने बिना  वेद-मंत्रों का पाठ व्यर्थ है।ऋग्वेद १.१६४.३९ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः ।यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यतिय इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥शब्दार्थऋचः = वेदमन्त्र, ऋचाएँअक्षरे = अविनाशी परम तत्त्व मेंपरमे व्योमन् = परम आकाशस्वरूप ब्रह्म मेंयस्मिन् = जिसमेंविश्वे देवाः = समस्त देवतागणनिषेदुः = स्थित हैं, आश्रित हैंयः तत् न वेद = जो उस तत्त्व को नहीं जानताकिम् ऋचा करिष्यति = वेदमन्त्र उसके क्या काम आएँगे?ये तत् विदुः = जो उस तत्त्व को जानते हैंते इमे समासते = वे ही वास्तव में स्थित/प्रतिष्ठित होते हैं।भावार्थसमस्त वेदमन्त्र