कोहिनूर: रोशनी के पहाड़ की अदृश्य सिसकियाँ और सदियों का प्रतिशोध

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आंध्र की उस तपती जमीन के नीचे, गोलकुंडा की खदानों में सन्नाटा सिर्फ फावड़ों की आवाज से टूटता था हजारों मजदूर पसीने से तर-बतर, जमीन के सीने को चीरकर कुछ ढूंढने की नाकाम कोशिश कर रहे थे इन्हीं में से एक था 'रामा', जिसकी पुश्तें इसी मिट्टी को खोदते-खोदते इसी मिट्टी में मिल गई थीं उस दिन हवा में एक अजीब सी भारीपन थी, जैसे कुदरत कोई बहुत बड़ा राज खोलने वाली होरामा का फावड़ा एक ऐसी कठोर सतह से टकराया जिसकी आवाज पत्थर जैसी बिलकुल नहीं थी उसने झुककर अपने कांपते हाथों से कीचड़ और मलबे की परतों को