ऋगुवेद सूक्ति--(१५) की व्याख्या तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्। १/१५/५भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है। पद-विश्लेषण--तव = तेरा / आपकाएव इद्धि (एव इद्धि/एव हि) = निश्चय ही, वास्तव मेंसख्यम् = मित्रता, मैत्री, सखा-भावस्तृतम् (स्तृत) = विस्तृत, फैलाया हुआ, स्थापितभावार्थ--“निश्चय ही आपकी (हे प्रभु!) मैत्री ही सर्वत्र स्थापित और शेष रहने वाली है।”इसे सरल शब्दों में —“हे प्रभु! अंततः आपकी ही मैत्री स्थिर और शाश्वत है।”यह भाव इस सत्य को व्यक्त करता है कि संसार की अन्य मित्रताएँ क्षणभंगुर हो सकती हैं, परन्तु ईश्वर का सखा-भाव अखंड और अटल है।“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची और कल्याणकारी है —